कुछ तो था…

सदियों पहले की बात नहीं, यही तो ज़माना था

तेरे-मेरे बीच में, कुछ तो था।

बातों का सैलाब न था, मगर तेरे पास

मुझे बताने को, कुछ तो था।

न खाई थी कोई कसम, न किया कोई वादा ही था

फिर भी साथ निभाने को, कुछ तो था।

वो तेरा मुझे देखना, वो मेरा पलकें झुकाना

बात कोई नयी नहीं, मगर कुछ तो था।

सदियों पहले की बात नहीं, यही तो ज़माना था

तेरे-मेरे बीच में, कुछ तो था।

मुलाकातें तो होती थी, मगर कोई बातें नहीं

फिर भी जि़क्र करने को, कुछ तो था।

वो तनहाई की तङपन, बेचैनी और बेकरारी

कुछ न सही मगर, कुछ तो था।

दुनिया की भीङ में, कोई अपना-सा लगा

कोई रिश्ता न था बीच में मगर, कुछ तो था।

जब आएगा वक्त इकरार-ए-इश्क का, कह दूँगी कि

इसे इश्क न कहने में, कुछ तो था।

सदियों पहले की बात नहीं, यही तो ज़माना था

तेरे-मेरे बीच में, कुछ तो था।

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22 Comments Add yours

  1. वाह बहुत खूब प्रतिभा जी

      1. स्वागत है आपका प्रतिभा जी

  2. Nice wording 👌🏻👌🏻👌🏻👌🏻😊😊😊

    1. Thanks a lot dear 😊😊

      1. Your welcome 😊😊😊

  3. Amogh says:

    बहुत सुंदर लिखा है आपने प्रतिभा जी।

    1. बहुत बहुत धन्यवाद 😊

  4. silentscreams2017 says:

    It’s so so beautiful

    1. Thanks a lot…
      Have a good time ! 🙂

      1. silentscreams2017 says:

        Is it okay if you could check out our blog ?

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